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विशेष लेख : रायपुर : छत्तीसगढ़ में फल-फूलों और सब्जियों की खेती : तेरह साल में रकबा चार गुणा और उत्पादन पांच गुणा बढ़ा

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                                                                                                                                                                                                                                                   आलेख-राजेश श्रीवास

रायपुर, 28 अक्टूबर 2016/ छत्तीसगढ़ की एक तिहाई से ज्यादा भूमि वन क्षेत्र है। इसके अलावा खेती  योग्य जमीन में भी दो तिहाई से आधी जमीन भर्री और भांठा है। भर्री एवं भाठा जमीन ही राज्य में उद्यानिकी के विकास के लिए वरदान साबित हो रही है। छत्तीसगढ़ में विगत 13 वर्षों में उद्यानिकी के क्षेत्र में भी उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। राज्य़ को उद्यानिकी की दृष्टि से भौगोलिक और जलवायु के आधार पर तीन क्षेत्रों में बांटा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्र (बस्तर), पठारी क्षेत्र (सरगुजा) और मैदानी क्षेत्र (रायपुर दुर्ग और बिलासपुर)। प्रदेश सरकार ने इन्ही क्षेत्रों के आधार पर उद्यानिकी के विकास और विस्तार के लिए कार्ययोजना बनाकर इसका क्रियान्वयन शुरू किया है। सुव्यवस्थित कार्ययोजना के कारण पिछले तेरह वर्ष में उद्यानिकी रकबे में 4 गुना एवं उत्पादन में 5 गुना वृद्धि हुई है। उद्यानिकी में फल-फूलों, सब्जियों,मसाला फसलों और औषधीय एवं सुंगधित पौधों की खेती शामिल है। वर्ष 2004-05 में उद्यानिकी फसलो की रकबा दो लाख एक हजार 555 हेक्टेयर था, जो 2015-16 में बढ़कर सात लाख 92 हजार 943 हेक्टेयर हो गया। इसी प्रकार 17 लाख 46 हजार 724 मीटरिक टन फल-फूल, औषधि और सुंगधित तथा सब्जियों का उत्पादन वर्ष 2004-05 में हुआ था। वर्ष 2015-16 में 91 लाख 62 हजार 691 मीटरिक टन उत्पादन हुआ।
    राज्य शासन के उद्यानिकी विभाग द्वारा उद्यानिकी विकास की नयी योजनाओं का क्रियान्वयन कलस्टर पद्धति के आधार पर किया जा रहा है। इसके लिए विकासखंड स्तर पर 25-25 गांवों के समूहों का चयन कर प्रत्येक गांव में कम से कम बीस एकड़ तथा प्रत्येक कलस्टर में कम से कम 200 एकड़ रकबे में उद्यानिकी फसलों की खेती शुरू की गयी है। छत्तीसगढ़ में उद्यानिकी फसलों में फलों की खेती सभी जिलों में होती है। यहां पर आम, केला, पपीता, अमरूद, नींबू, नारंगी, कटहल, मौसबी, काजू, सीताफल, लीची, तरबूज, खरबूज, बेर, आवला, चीकू, अनार, अंगूर, नारियल, नाशपत्ती आदि फलों की खेती बहुतायत मात्रा में होती है। प्रदेश का रायगढ़ जिला फलों की खेती में सबसे आगे है। राज्य के कबीरधाम, कांकेर, बलौदाबाजार, कोरबा, बलरामपुर, सीतालफलों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। कोण्डागांव जिले में नारियल की अच्छी खेती होती है। पिछले साल कोण्डागांव जिले में सात हजार 517 मीटरिक टन नारियल का उत्पादन हुआ। बस्तर, कोण्डागांव, कांकेर, दंतेवाड़ा, रायगढ़, कोरिया और नारायणपुर में काजू की अच्छी खेती अपनी पहचान रखते हैं। इसके अलावा आम, केला, पपीता, अमरूद, नीबू, कटहल की खेती प्रदेश के लगभग सभी जिलों में हो रही है।  छत्तीसगढ़ के तरबूज की मांग को विदेशों में भी है। छत्तीसगढ़ से तरबूज का निर्यात खाड़ी के देशों में किया जाता है। महानदी बेसिन के क्षेत्रों में जांजगीर-चाम्पा और महासमुंद जिले में तरबूज की सबसे अधिक खेती होती है।
    राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में फूलांे की खेती के रकबे और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गयी है। छत्तीसगढ़ में गेंदा, गुलाब, रजनीगंधा, गुलदाउदी, ग्लेडियोलस, चमेली और गिलार्डिया के फूल खिलते हैं। छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जिलों में गेंदे की खेती होती है। गुलाब के लिए बिलासपुर और कोरबा जिला प्रसिद्ध है। चमेली की खेती मुख्यतः दो जिलों में रायपुर और धमतरी जिले में होती है। छत्तीसगढ़ में अदरक, धनिया, मिर्च, लहसून, हल्दी, कारयत, मेथी और अंजवानी जैसे मसाला फसलों की खेती की जाती है। अदरक सुकमा जिले को छोड़कर अन्य सभी जिलों में पैदा होता है। धनिया और मिर्च की खेती छत्तीसगढ़ के सभी जिलों के किसान करते हैं। औषधीय और सुंगधित फसलों में मुख्य रूप से लेमनग्रास, खस, एलोविरा, सफेद मुसली, बुच, सर्पगंधा, ई-सिट्रीडोरा, अश्वगंधा, सुंगधरा, सनय और पामरोसा-जमरोसा की खेती होती है। बिलासपुर जिला औषधीय और सुंगधित फसलों की खेती के लिए भी प्रदेश में आगे है।    
प्रदेश के सभी जिलों में साग-सब्जियां होती है। राज्य में फूल गोभी, पत्ता गोभी, गांठ गोभी, बैंगन, टमाटर, रमकेलिया (भिंडी), आलू, लोबिया, मटर, करेला, सेमी, चुरचुटिया (गंवारफल्ली), मखना (कद्दू), लौकी, तरोई, मुनगा, कोचई (अरबी), मुरई, गाजर, कुंदरू, परवल, शक्करकंद, जिमीकांदा और प्याज की खेती किसानों द्वारा की जाती है। वैसे तो छत्तीसगढ़ की सभी जिलों में आलू की खेती होती है, लेकिन पठारी क्षेत्र के जशपुर, सरगुजा, बलरामपुर और सूरजपुर जिले आलू की खेती के लिए विशेष पहचान रखते हैं। टमाटर की खेती प्रदेश के सभी जिलों में होती है। कांकेर जिले में जिमीकांदा का अच्छा उत्पादन होता है। पिछले साल इस जिले में तीन हजार सात सौ इक्कीस मीटरिक टन जिमीकंद का उत्पादन किया गया था।
नया राज्य बनने के बाद से केवल उद्यानिकी फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता में ही वृद्धि नहीं हुई है अपितु उद्यानिकी के नवीन तकनीक एवं उत्पादों को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने हेतु आवश्यक संरचनाओं में भी अत्यधिक विकास किया गया है। वर्ष 2004-05 में उद्यानिकी फसलों के संरक्षण हेतु आवश्यक कोल्ड स्टरोज, जिसकी संख्या 45 थी, अब बढ़कर 94 हो गई है जिसमें चार लाख 70 हजार मीटरिक टन उद्यानिकी उत्पाद सुरक्षित रखे जा सकते हैं। इसी प्रकार फसलोत्तर प्रबंधन के अन्य आवश्यक संरचनाएं विकसित की गई है। इसके अंतर्गत 2566 पैक हाउस, 1066 इवापोरोटिव लो एनर्जी कूल चेम्बर, 625 प्रिजर्वेशन यूनिट, 457 ओनियन स्टोरेज, एक काजू प्रसंस्करण इकाई  तथा  दो टमाटर प्रसंस्करण इकाई की स्थापना राज्य में हुई है। इसी प्रकार किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य दिलाने एवं विपणन के लिए भी अधोसंरचना विकसित की गई है।ऐसे क्षेत्रों जहां सिंचाई की सुविधा नहीं है, वहां उद्यानिकी फसलों को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त सिंचाई सुविधाओं का विकास किया गया है। राज्य में 223 सामुदायिक तालाब, 842 छोटे तालाब एवं 5695 नलकूप खोदे गए हैं। इसके अतिरिक्त उपलब्ध जल के समुचित उपयोग के लिए 17 हजार 932 हेक्टेयर में ड्रिप एवं 52 हजार 682 हेक्टेयर में स्प्रिंकलर सिंचाई की सुविधा किसानों को उपलब्ध करायी गयी है। विपरीत मौसम में उद्यानिकी फसलों विशेष रूप से फूलों एवं सब्जियों की खेती को बढ़ावा देने के लिए 250 हेक्टेयर में ग्रीन हाउस, 2409 हेक्टेयर में शेडनेट हाउस, 285 हेक्टेयर में प्लास्टिक टनल तथा 3758 हेक्टेयर में प्लास्टिक मल्चिंग की सुविधा किसानो को प्रदान की गई है। चूंकि इन संरचनाओं में क्रास पालिनेशन की समस्या रहती है, ऐसी स्थिति में अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए मधुमक्खी पालन को भी बढ़ावा दिया गया है तथा किसानों को 1904 मधुमक्खी कालोनी तथा 1440 मधुमक्खी छत्ते भी दिए गए हैं। उद्यानिकी किसानों में टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए विगत  13 वर्षों में 15 हजार 656 हेक्टेयर रकबे में जैविक खेती एवं प्रमाणीकरण हेतु के लिए किसानों को सहायता उपलब्घ करायी गयी। इसी प्रकार जैविक खाद उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 77 हजार 660 वर्मी कम्पोस्ट एचडीपीई बेग किसानों को वितरित किए गए तथा तीन हजार 602 पक्की टंकी बनाने के लिए उद्यानिकी किसानों को आर्थिक सहायता मुहैया करायी गयी।
        उद्यानिकी फसलों जैसे- फलों एवं सब्जियों की उच्च गुणवत्तायुक्त रोपण सामाग्री (पौध) की उपलब्धता एक समस्या थी जिसे दूर करने के लिए विभाग द्वारा सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र में कुल 82 मॉडल नर्सरी स्थापित की गई तथा 30 नर्सरियों का उन्नयन भी किया गया। केले के टिशु-कल्चर पौध की उपलब्धता को सुलभ बनाने के लिए तीन व्यवसायियों को खुद का टिशु-कल्चर लैब स्थापित करने के लिए सहायता दी गयी। प्रतिकूल मौसम में उच्च गुणवत्तायुक्त सब्जियों की रोपणी उपलब्ध कराने 24 सार्वजनिक क्षेत्र में छोटी मॉडल रोपणी एवं 10 निजी क्षेत्र में मॉडल रोपणियॉं स्थापित कराई जा चुकी है। राज्य के दुर्ग एवं जगदलपुर में 1-1 इस प्रकार कुल 2 मॉडल फ्लोरीकल्चर सेंटर भी खोले गए हैं।
    राज्य सरकार ने वर्ष 2022 तक छत्तीसगढ़ के उद्यानिकी किसानों की आय दोगुनी करने रोडमेप तैयार किया गया है। उद्यानिकी फसलों में आम, अंगूर, नीबू, बेर, अनार, प्याज, टमाटर, आलू आदि के प्रसंस्करण और पैकिंग की व्यवस्था करने लघु तथा मध्य श्रेणी के उद्योगों को बढ़ावा दे रहे हैं। फल एवं साग-सब्जी रूट पर कलस्टर चयन कर उद्यानिकी का विस्तार किया जाएगा। रूट बनाकर उद्यानिकी फसलों के परिवहन एवं बाजार सुविधा बनाने के लिए संस्थागत व्यवस्था तैयार की जाएगी। हर साल उ़द्यानिकी से जुड़ी बीस नर्सरी का आधुनिकरण किया जाएगा। किसानों को उच्च गुणवत्ता के पौधे तैयार कर उपलब्ध कराए जाएंगे।(क्रमांक- 3721)


 

Date: 
28 Oct 2016