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विशेष लेख : रायपुर : प्रदेश में ‘सबके लिए शिक्षा’ का रचा जा रहा परिवेश

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 आलेख - प्रेमलाल पटेल


रायपुर 28 अक्टूबर 2016/छत्तीसगढ़ राज्य में ‘सबके लिए शिक्षा’ का ध्येय रखते हुए एक शिक्षित और संस्कारवान समाज का परिवेश रचा जा रहा है। इसके तहत स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा सभी की पहुंच के भीतर शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराने विशेष जोर दिया गया है। राज्य में इसके लिए एक किलोमीटर की दूरी पर प्राथमिक शाला, तीन किलोमीटर की दूरी पर उच्च प्राथमिक शाला, पांच किलेामीटर की दूरी पर हाईस्कूल और सात किलोमीटर की दूरी पर हायर सेकेण्डरी स्कूल खोलने की नीति निर्धारित कर लगभग आठ हजार नवीन विद्यालय प्रारंभ किए गए है। यहां प्रारंभिक शिक्षा के लोक व्यापीकरण को आधार मानकर विद्यालयों में राज्य के लगभग 60 लाख विद्यार्थियों को प्रवेश दिलाने में सफलता प्राप्त की गई है।
    राज्य में वर्ष 2003-04 में 31 हजार 907 प्राथमिक तथा सात हजार 89 मिडिल स्कूल थे, जो अब बढ़कर क्रमशः 33 हजार 997 और 16 हजार 291 हो गए हैं। वर्ष 2003-04 में एक हजार 176 हाई स्कूल तथा एक हजार 386 हायर सेकेण्डरी स्कूल थे, जो अब बढ़कर क्रमशः दो हजार 605 और तीन हजार 726 हो गए हैं। राज्य के पहली से दसवीं तक के सभी बच्चों को मुफ्त पाठ्य पुस्तक का वितरण किया जा रहा है। वर्ष 2003-04 में सात लाख 27 हजार 751 पुस्तकों का वितरण किया गया था। यह संख्या वर्ष 2015-16 में दो करोड़ 91 लाख 75 हजार 802 है। राज्य में गत दो वर्षो से प्राथमिक तथा मिडिल स्कूलों के सभी बच्चों को दो सेट गणवेश दिए जाने का प्रावधान किया गया है। सरकार द्वारा शुरू किए गए सरस्वती सायकल योजना का सकारात्मक परिणाम आया है। इस योजना के पूर्व हाई स्कूलों में बालकों की तुलना में बालिकाओं का प्रतिशत 65 रहता था, जो अब बढ़कर लगभग 95 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है। राज्य में संचालित दर्ज संख्या वृद्धि अभियान के परिणामस्वरूप अब मात्र एक प्रतिशत से भी कम बच्चे शालाओं से बाहर है, इन्हें भी शिक्षा की मूलधारा में जोड़ने का प्रयास जारी है। वर्तमान में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के बालक-बालिकाएं शालाओं में उनकी जनसंख्या के अनुपात में विद्यालय में अध्ययनरत् है।
    हमारे देश की आर्थिक विकास की गति में वृद्धि आयी है। अतएव बच्चों को वाणिज्य विषय में अध्ययन लाभकारी होगा, इसे ध्यान में रखकर शासन द्वारा सभी उच्चतर माध्यमिक शालाओं में वाणिज्य संकाय खोले गए है। साथ ही आगे खुलने वाली सभी उच्च्तर माध्यमिक स्कूलों में कला, विज्ञान तथा वाणिज्य संकाय स्वमेव खुलेंगे, ऐसी नीति बना दी गई है। निःशुल्क तथा अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत एक लाख 28 हजार 639 बच्चों को अद्यपर्यन्त प्रदेश के निजी विद्यालयों में प्रवेश दिलाया गया है। इनके शिक्षण शुल्क की प्रतिपूर्ति के लिए 35 करोड़ रूपए व्यय किए जा रहे हैं।
    राज्य के आदिवासी अंचलों में स्थित छोटे बसाहट में 10 बच्चों की उपलब्धता के आधार पर 47 विद्यालयों में डारमेटरी की व्यवस्था की गई है। वहां लगभग दो हजार 300 बच्चों को निःशुल्क आवास तथा भोजन की व्यवस्था सहित गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान की जा रही है। इसी तरह समावेशी शिक्षा के अंतर्गत 62 हजार 200 विशेष आवश्यकता वाले बच्चे राज्य में चिन्हांकित किए गए हैं। चिन्हांकित बच्चों को आवश्यकतानुसार सर्जरी, कृत्रिम उपकरण, प्रमाण पत्र आदि प्रदाय किया गया है। इन सभी बच्चों को शासकीय विद्यालयों और आवश्यकतानुसार विशेष आवासीय प्रशिक्षण केन्द्रों तथा गृह आधारित शिक्षा उपलब्ध कराया जाकर शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा जा रहा है।
    राज्य के सभी गांवों में प्रारंभिक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराने तथा शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए शासन द्वारा समुदाय की सहभागिता से सर्वशिक्षा अभियान भी चलाया जा रहा है। इसके तहत 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों को स्कूल के माध्यम से शिक्षा सुविधा उपलब्ध कराए जा रहे हैं। साथ ही स्कूल ना जा सकने वाले बच्चे के लिए विशेष प्रशिक्षण सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है। नक्सल प्रभावित जिलों के स्कूल भवन क्षतिग्रस्त अथवा बंद होने के फलस्वरूप अप्रवेशी और शाला त्यागी बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़े रखने के लिए प्री-फेब्रिकेटेड स्ट्रक्चर की स्थापना सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत की गई है, जिसे वर्ष 2011-12 में आवासीय विद्यालय का दर्जा दिया गया। इन 60 विद्यालयों की क्षमता 30 हजार सीटर की है। इसी तरह अप्रवेशी तथा शाला त्यागी शहरी वंचित, गरीब, फुटपाटाथी, अनाथ, असहाय, निःशक्त, पलायन प्रभावित ऐसे विशेष श्रेणी के बच्चे जिन्हें वास्तव में बिना आवासीय व्यवस्था कराये शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा जाना संभव नहीं हो पा रहा था। ऐसे बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़े जाने के लिए सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत रायपुर, दुर्ग तथा अंबिकापुर में एक सीटर के 10 आवासीय विद्यालय संचालित है। इसके अलावा शाला त्यागी तथा अप्रवेशी बच्चों का उम्र के अनुसार समुचित कक्षा में प्रवेश के साथ विशेष आवासीय तथा गैर आवासीय प्रशिक्षण की निःशुल्क व्यवस्था की गई है। वर्ष 2015-16 में शाला से बाहर बच्चों की चिन्हांकित संख्या 50 हजार 373 थी, इनमें से 14 हजार 332 बच्चों को पुनः शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा गया है। साथ ही आठ हजार 560 बच्चों को विशेष आवासीय तथा गैर आवासीय प्रशिक्षण केन्द्रों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में 47 डॉरमेटरी युक्त विद्यालय और 93 कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय भी संचालित किए जा रहे हैं। इसके अलावा मदरसा शिक्षा के माध्यम से शिक्षा का आधुनिकरण और संस्कृत शिक्षा के लिए सुविधा उपलब्ध करायी जा रही है।  
    प्रदेश में सबके लिए शिक्षा के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा एक जुलाई 2008 को छत्तीसगढ़ राज्य ओपन स्कूल का भी शुभारंभ किया गया। इससे शाला त्यागी बच्चों और लोगों के लिए आगे की शिक्षा का कार्य सुगम हुआ है। इसके अलावा साक्षर भारत कार्यक्रम के तहत नव साक्षरों को आगे बढ़नेे के लिए राष्ट्र व्यापी परीक्षा महाअभियान कार्यक्रम चलाया गया। इसके अंतर्गत लगभग 28 लाख प्रौढ़ों को शिक्षा की मुख्य धारा में लाने के लिए कार्रवाई की गई है। क्रमांक-3729

 

Date: 
28 Oct 2016