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विशेष लेख : रायपुर : माटी शिल्पियों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध-छत्तीसगढ़ सरकार

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आलेख- ए.बी. काशी


रायपुर, 06 फरवरी 2017/मिट्टी सेे बने बर्तन, खिलौने, देवी-देवताओं की मूर्तियां और साजो-सामान आदि का उपयोग आदि काल से चला आ रहा है, इस बात का प्रमाण सिन्धु घाटी की सम्यता, हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की खुदाई में मिला है। मिट्टी से बनी विभिन्न सामग्रियों की उपयोगिता आज भी बरकरार है। आधुनिक युग में मिट्टी के पात्रों, खिलौनों और सजावटी सामानों के उपयोग में कमी आयी है। मिट्टी से बने सामग्रियों का उपयोग स्वास्थ्य और पर्यावरण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। माटी कला से जुड़े कुम्हारों और माटी शिल्पियों के कल्याण के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने ग्रामोद्योग विभाग के अधीन 14 मार्च 2012 को ’’छत्तीसगढ़ माटी कला बोर्ड’’ का गठन किया है।
बोर्ड का मुख्य उद्देश्य कुम्हारों और माटी शिल्पियों को तकनीकी प्रशिक्षण देना, उन्हें आर्थिक सहायता और विपणन सुविधा के माध्यम से व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम बनाना, अधोसंरचना विकास के लिए मार्गदर्शन देना, गरीब और कमजोर माटी शिल्पियों के आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक विकास के लिए सहायता देना, माटी शिल्पियों को स्वरोजगार के अवसर और उद्यमिता को प्रोत्साहित करना और नीति निर्माण तथा योजनाबद्ध क्रियान्वयन के जरिए माटी शिल्पियों का सर्वांगिण विकास सुनिश्चित करना है। छत्तीसगढ़ माटी कला बोर्ड द्वारा माटी शिल्पियों के विकास कि लिए अनेक योजनाएं शुरू की गयी है। जिसके तहत राज्य अब तक 18 हजार लोगों को माटी शिल्प में रोजगार उपलब्ध कराया जा चुका है। पिछले वित्तीय वर्ष 2015-16 में 15 हजार माटी शिल्पियों का सर्वे कर उनका पंजीयन किया गया। चालू वित्तीय वर्ष 2016-17 में 16 हजार माटी शिल्पियों के पंजीयन का लक्ष्य रखा गया है। बोर्ड द्वारा महासमुंद जिले के बसना विकासखण्ड के ग्राम गढ़फुलझर में ग्लेजिंग यूनिट की स्थापना की गयी है। इसके माध्यम से 400 माटी शिल्पी परिवार जीवन यापन कर रहे हैं। बोर्ड द्वारा प्रदेश के सभी 27 जिलों में ग्लेजिंग यूनिट लगाने का लक्ष्य है। कुंभकार टेराकोटा योजना के तहत 1745 माटी शिल्पियों को निःशुल्क विद्युत चाक वितरित करके उन्हें स्वरोजगार से जोड़ा गया है। डिजाईन विकास योजना के तहत हस्तशिल्प विकास आयुक्त भारत सरकार के सहयोग से प्रदेश के 240 माटी शिल्पी परिवारों को उच्च तकनीकी प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया गया। माटीशिल्पियों को हस्तचलित रिक्शा ठेला प्रदाय योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2015-16 में 100 शिल्पियों को निःशुल्क हस्त-चलित रिक्शा ठेला दिया गया। इससे माटी शिल्पी खुद के द्वारा बनाए गए माटी के दीया, गमला, मटका, कबेलू, मूर्तियां आदि को ठेले पर रखकर घूम-घूम कर बेचते है। ठेले का उपयोग कच्चा माल पकाने के लिए लकड़ी, कण्डा, भूसा आदि लाने-ले जाने में भी करते हैं। इस योजना से गरीब माटी शिल्पियों के आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है। माटी शिल्पियों को कच्चे माल की खरीदी में छूट, उनके बनाए गए सामानों का व्यापक प्रचार-प्रसार, विभिन्न प्रदर्शनियों का आयोजन और एम्पोरियमों की स्थापना की जा रही है। बोर्ड द्वारा प्रदेश के माटी शिल्पियों को देश के अन्य राज्यों की माटी से निर्मित कलाकृतियों का अध्ययन कराने की भी योजना है।
    प्रदेश के माटी शिल्पियों की आर्थिक-सामाजिक विकास के लिए अनेक योजनाएं प्रस्तावित है। इनमें कुम्हार बाहुल्य गावों को चिन्हित करके वहां कम लागत में ताप भट्टी का निर्माण, सभी जिलों में ग्लेजिंग यूनिट की स्थापना, प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर माटी शिल्पियों हेतु कच्चे माल (मिट्टी) के लिए आरक्षित पांच एकड़ जमीन की बाउन्ड्री वाल के लिए आर्थिक सहायता,  बोर्ड द्वारा संचालित सभी शबरी एम्पोरियम में कन्साइनमेंट के आधार पर माटी शिल्पों का विक्रय, डाक्यूमेंट्री फिल्म के जरिए माटी शिल्पिों का प्रचार-प्रसार  आदि शामिल है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में आने-जाने वाली ट्रेनों और रेल्वे स्टेशनों पर चाय के लिए कुल्हड़ की अनिवार्यता के लिए रेल्वे प्रशासन से माटी कला बोर्ड का प्रयास जारी है, ऐसा होने से कुम्हारों को नियमित रूप से रोजगार के अवसर मिलते रहेंगे।क्रमांक-5472



 

Date: 
06 Feb 2017