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‘रमन के गोठ’ आकाशवाणी से प्रसारित विशेष कार्यक्रम ( दिनांक-14 अगस्त 2016, समय-प्रातः 10.45 से 11.05 बजे )

स्वतंत्रता संग्राम की कहानी
मुख्यमंत्री की जुबानी


श्रोताओं नमस्कार !
(पुरूष उद्घोषक की ओर से)

  • आकाशवाणी के महत्वपूर्ण प्रसारण ‘रमन के गोठ’ में हम, आप सभी श्रोताओं का हार्दिक स्वागत करते हैं।
  • श्रोताओं! हर्ष का विषय है, कि आज आकाशवाणी के महत्वपूर्ण प्रसारण ‘‘रमन के गोठ’’ का आज पूरा एक वर्ष हो चुका है। ‘रमन के गोठ’ की बारहवीं कड़ी के लिए माननीय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जी स्टुडियों में पधार चुके हैं। डॉ. रमन सिंह जी कार्यक्रम में आपका बहुत-बहुत स्वागत है।

 

मुख्यमंत्री द्वारा छत्तीसगढ़ी में

  • नमस्कार। जम्मो संगी-जहुंरिया, सियान-जवान, दाई-बहिनी मन ला जय जोहार।
  • ये प्रसारण अइसन बखत म होवत हे, जब हमन देश के, आजादी के उनहत्तरवां सालगिरह मनाबो।
  • जम्मो मन ल सुराजी तिहार के गाड़ा-गाड़ा बधाई।
  • एक बात अऊर बने होये हे कि ऐ प्रसारण के एक बछर पूरा होगे। अऊ एक बछर में आप मन के बहुत ज्यादा आर्शीवाद अऊ सहयोग मिले हे, सुझाव मिले हें, सबला बहुत-बहुत धन्यवाद।

महिला उद्घोषक द्वारा

  • मुख्यमंत्री जी, सचमुच स्वतंत्रता दिवस का नाम लेते ही हमारा रोम-रोम पुलकित हो जाता है। आजाद हवा में लहराता तिरंगा झण्डा हमें, लम्बे संघर्ष और महान बलिदानों की याद दिलाता है। ऐसी धारणा है कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में छत्तीसगढ़ के शहीदों को उनके योगदान के लिए समुचित प्रसिद्धि नहीं मिल पाई थी। आपका क्या सोचते है, इस बारें में ?

मुख्यमंत्री जी द्वारा

  • अतीत में भारत ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था। अंग्रेजों ने लगभग  तीन सौ वर्ष तक भारत में राज किया। भारतीयों पर बहुत जुल्म किए। राजाओं से लेकर प्रजा तक, सबको प्रताड़ित किया। देश की बहुमूल्य सामग्री लूटकर ले गए। हमारा आर्थिक-सामाजिक ढांचा बरबाद कर दिया।
  • फिरंगियों के अन्याय और अत्याचार के खिलाफ 1857 में जोरदार आक्रोश फूटा, जिसे हम ‘आजादी की पहली लड़ाई’ कहते हैं।
  • लेकिन छत्तीसगढ़ में यह कहानी 33 साल पहले, 1824 में ही शुरू हो गई थी। अबुझमाड़ के परलकोट में वीर गेंद सिंह, वनवासियों को छापामार युद्ध सिखा रहे थे। अंग्रेजों को इसकी खबर लगी तो उन्होंने कर्नल एगन्यू को भेजा। गेंद सिंह की फौज जमकर लड़ी। आखिर वे गिरफ्तार कर लिए गए। 10 जनवरी, 1825 को परलकोट महल के सामने उन्हें फांसी दी गई।
  • दूसरी घटना 1856 की है। सोनाखान के सपूत नारायण सिंह को फिरंगियों का दमन बर्दाश्त नहीं हो रहा था। जब अकाल पड़ा और फिरंगी सरकार जमाखोरों का साथ देने लगी। तब नारायण सिंह ने अनाज के गोदाम पर हमला किया और सारा अनाज जनता को बांट दिया। उनका साहस जनगीत बन गया-

परन ठान के, कफन बांध के,
भारत मां के, करिन बिचार।
गरजिस बघवा वीर नारायण,
लिन तलवार निकार।।

  • वे नारायण से ‘वीर नारायण’ हो गए। लेकिन अंग्रेजों ने इसे राजद्रोह मानते हुए वीर नारायण सिंह को जेल भेज दिया।
  • इस बीच देश के कई स्थानों में सुलग रही चिंगारी भड़कने लगी थी और 1857 की महान क्रांति का जन्म हुआ। जिसकी आंच छत्तीसगढ़ में भी पहंुची और वीरनारायण सिंह जेल से भाग निकले।
  • उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘लेफ्टिनेंट स्मिथ’ को धूल चटा दी और आखिरकार गिरफ्तार हुए और 19 दिसम्बर 1857 को रायपुर के जयस्तम्भ चौक में उन्हें फांसी दी गई।
  • उस समय संबलपुर, छत्तीसगढ़ में शामिल था। वहां के राजा महाराज साय के निधन के बाद अंग्रेजों ने सुरेन्द्र साय को बेदखल कर छल-पूर्वक संबलपुर राज की कमान संभाल ली। लेकिन वीर सुरेन्द्र साय शांत नहीं बैठे। उन्होंने उड़ीसा और छत्तीसगढ़, दोनों अंचलों में लोगों को संगठित किया। सीधी लड़ाई लड़ी और कई अंग्रेजों को मार गिराया। अंत में असीरगढ़ किले में गिरफ्तारी के दौरान वे शहीद हुए।

पुरूष उद्घोषक द्वारा

  • मुख्यमंत्री जी, छत्तीसगढ़वासी भारत माता की आजादी के लिए सन् 1857 के पहले से लड़ रहे थे। यह बात सचमुच ज्यादा लोग नहीं जानते हैं। आपने बहुत अच्छी जानकारी दी। इससे हमारी नई पीढ़ी को अपने वीर पुरखों और उनके गौरवशाली इतिहास के बारे में पता चला। अब तो वे यह जानना चाहेंगे कि यह लड़ाई आगे कैसे बढ़ी?

मुख्यमंत्री जी द्वारा

  • मेरी स्मृति में अब वो पुरानी घटनायें स्पष्ट हो के सामने आयी है और उस दौर में पड़ी हुई बाते आंख के सामने स्पष्ट है। कैसे 1858 में रायपुर में जो फौजी छावनी थी, उसे ‘तीसरी रेग्युलर रेजीमेंट’ कहते थे, जहां ठाकुर हनुमान सिंह ‘मैग्जीन लश्कर’ के पद पर काम करते थे। भारतीयों पर फौजी अफसर ‘सार्जेन्ट मेजर सिडवेल’ के अत्याचार से वे बेहद नाराज रहते थे। एक रात हनुमान सिंह और उनके साथियों ने ‘सिडवेल’ के बंगले में घुसकर उसकी हत्या कर दी। इस क्रांति के नायक 17 सिपाहियों को फिरंगियों द्वारा पुलिस लाइन रायपुर में खुलेआम तोप से उड़ा दिया गया, जिनमें हवलदार गाजी खान, गोलदांज अब्दुल हयात, मुल्लू, शिवरीनारायण, पन्नालाल, मातादीन, ठाकुर सिंग, बली दुबे, अकबर हुसैन, लल्ला सिंह, बल्लू, परमानंद, शोभाराम, दुर्गा प्रसाद, नजर मोहम्मद, देवीदीन, शिव गोविंद शामिल थे।
  • 1876 का मुरिया विद्रोह एक बड़ी घटना माना जाता है। बस्तर में फिरंगी सरकार, आदिवासियों के लोकप्रिय राजा भैरमदेव के खिलाफ जनता को भड़काने लगी में थी। जनता ने अपने राजा का साथ दिया। उस समय अंग्रेजों की फूट डालने की नीति नाकाम हो गई।
  • उधर पूरे देश में किसानों, मजदूरों, कामगारों पर अंग्रेजों के जुल्मो-सितम बढ़ते जा रहे थे। उसके खिलाफ एकजुटता के लिए नए-नए संगठन बनने लगे। 1907 के बाद आजादी के लड़ाके, गरम और नरम दल में बंट गए। लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चन्द्र पाल का प्रभाव बढ़ा। ‘लाल-बाल-पाल’ से प्रेरित होकर रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग सहित छत्तीसगढ़ का मैदानी हिस्सा आजादी की लड़ाई का केन्द्र बना और क्रांति का विस्तार हुआ।
  • रायपुर में एक बड़ा अधिवेशन हुआ। पं. रविशंकर शुक्ल, वामन राव लाखे, डी.एन. चौधरी, हरिबाबू चटर्जी, रावसाहेब दानी, खपरेलवाले आदि का नेतृत्व उभरने लगा।

महिला उद्घोषक द्वारा

  • मुख्यमंत्री जी, वो दौर कब आया, जब पूरे छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम की मशालें जल उठीं। सरगुजा से लेकर बस्तर तक क्रांति की आग फैल गई?

मुख्यमंत्री जी द्वारा

  • 1910 तक तो सचमुच ईब से इन्द्रावती तक यह आंदोलन फैल गया था। बस्तर में इंद्रावती के तट पर वीर गुण्डाधूर ने करों में वृद्धि और अंग्रेजों के कारिंदों की ज्यादती के खिलाफ भूमकाल विद्रोह छेड़ा, जो काफी तेजी से जंगलों में फैला। वीर गुण्डाधूर, मूरतसिंह बख्शी, बाला प्रसाद नाजिर, वीर सिंह बंदार, लाला कालिन्द्र सिंह और उनके साथियों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था।
  • बिहार से शुरू हुए ‘ताना भगत आंदोलन’ की लपटें सरगुजा में फैलीं। 1918 में वीर जतरा उरांव और उनके साथियों की गिरफ्तारी के बाद तो आंदोलन इतना उग्र हुआ कि उसमें सरगुजा अंचल के कई सेनानी शहीद हुए।

पुरूष उद्घोषक द्वारा

  • मुख्यमंत्री जी, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी भी छत्तीसगढ़ आए थे। गांधी जी के प्रवास के बाद आंदोलन की दिशा और दशा में किस तरह का बदलाव हुआ?

मुख्यमंत्री जी द्वारा

  • आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी दो बार, 1920 और 1933 में छत्तीसगढ़ आए।
  • 1920 के कण्डेल नहर सत्याग्रह का अपना रोचक और क्रांतिकारी इतिहास है। कण्डेल नहर से पानी लेने के लिए किसानों पर टैक्स लाद दिया गया। टैक्स नहीं भर पाने वाले किसानों को सताया जाने लगा। उनके गाय-बैल आदि जब्त होने लगे। इस जबरदस्ती के विरोध में पं. सुन्दर लाल शर्मा, नारायण राव मेघावाले, छोटे लाल श्रीवास्तव के नेतृत्व में सत्याग्रह किया गया, जिसमें बाजीराव कृदत, नत्थू जगताप, उमर सेठ, हजारी लाल जैन आदि ने भूमिका निभाई।  गांधी जी भी कण्डेल नहर सत्याग्रह के लिए आने ही वाले थे कि अंग्रेजों ने अपने कदम पीछे ले लिए और सत्याग्रहियों की जीत हुई।
  • फिर भी गांधी जी छत्तीसगढ़ आए और कण्डेल सत्याग्रहियों से मिले। उन्होंने रायपुर, धमतरी और दुर्ग का दौरा किया था। रायपुर में जिस जगह पर गांधी जी की सभा हुई, वह जगह गांधी चौक के नाम से प्रसिद्ध हो गई और क्रांति का प्रतीक बन गई।
  • उस समय पं. सुन्दर लाल शर्मा के विचारों और कार्यप्रणाली से गांधी जी इतने प्रभावित हुए कि उन्हें अपना ‘गुरू’ कहा था।
  • इस बीच गांधी जी ने ‘असहयोग आंदोलन’ की घोषणा कर दी। सरकारी संस्थाओं का त्याग करने वालों के लिए 1921 में पं. माधव राव सप्रे की पहल पर, रायपुर में एक राष्ट्रीय विद्यालय खोला गया। महंत लक्ष्मीनारायण दास, एन.डी. दानी, शिवदास डागा, ई. राघवेन्द्र राव, यतियतन लाल और उनके साथियों का योगदान बढ़ने लगा।
  • 1924 में ठाकुर प्यारे लाल सिंह के नेतृत्व में हजारों मजदूरों ने राजनांदगांव में कपड़ा मिल प्रबंधन की ज्यादतियों के खिलाफ प्रदर्शन किया। 1930 में ठाकुर साहब ने ‘बहिष्कार आंदोलन’ की जिम्मेदारी संभाली।
  • 1930 के ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ के दौरान पं. वामन राव लाखे, ठाकुर प्यारे लाल सिंह, शिव दास डागा, मौलाना रउफ एवं महंत लक्ष्मी नारायण दास ‘पांच पाण्डव’ कहलाए। 16 दिसम्बर, 1930 को धमतरी में ‘जंगल सत्याग्रह’ के दौरान आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ। अब तो घर-घर से सेनानी निकलने लगे।
  • डॉ. खूबचंद बघेल ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया। ‘झण्डा सत्याग्रह’, ‘जंगल सत्याग्रह’, ‘विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार’ जैसे आंदोलनों में खूब भीड़ जुटने लगी।
  • 1932 में ‘अवज्ञा आंदोलन’ के दूसरे दौर में ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने भू-राजस्व का भुगतान नहीं करने का आव्हान किया।
  • देश के अन्य भागों की तरह यहां भी ‘वानर सेना’ का गठन हुआ जो पर्चे चिपकाने और संदेश पहुंचाने का काम करती थी।
  • समाज उत्थान के लिए देशव्यापी यात्रा के दौरान महात्मा गांधी 1933 में छत्तीसगढ़ आए। उन्होंने 23 से 28 नवम्बर के बीच छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों का दौरा किया।
  • कांकेर में इंदरु केवट ने साल वृक्षों की कटाई और युद्धकोष के लिए जनता से पैसे वसूलने का विरोध किया था। वे अपने साथ तिरंगा झंडा लेकर चलते थे। 1942 में गिरफ्तार किए गए। उन्हें छुड़ाने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। वे ‘बस्तर के गांधी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
  • 8 अगस्त 1942 को ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू हुआ। तब तो छत्तीसगढ़ के हर निवासी के दिल में संग्राम और बलिदान की आग धधक रही थी। विरोध, गिरफ्तारी, जेल यात्रा और लौटकर फिर विरोध। यही जीवन चक्र था, जिसमें परिवार के सभी सदस्य साथ देते थे।

पुरूष उद्घोषक द्वारा

  • डॉक्टर साहब, स्वतंत्रता संग्राम में अनेक सेनानी ऐसे भी थे, जिनका योगदान तो बहुत रहा लेकिन उन्हें गुमनामी में जीवन बिताना पड़ा।

मुख्यमंत्री जी द्वारा

  • उस दौर में कोई अपनी वाह-वाही के लिए काम नहीं करता था। सबका एक लक्ष्य था- भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराना। पुरूष हो या महिला, ज्यादा से ज्यादा त्याग की भावना से काम करते थे। वे कुछ और नहीं सोचते थे।
  • परस राम सोनी, धनी राम वर्मा, अनंत राम बर्छिहा, पं. रामदयाल तिवारी, जय नारायण पाण्डेय, दुर्गा सिंह सिरमौर, लखन लाल मिश्र, हरिप्रेम बघेल, रेशम लाल जांगड़े, कुंजबिहारी चौबे, डी.आर. धृतलहरे, रघुनाथ भाले, डॉ. कोदू राम यदु, काकेश्वर बघेल, लालमणि तिवारी, पंकज तिवारी, बाबूलाल बामरे, रामानंद दुबे, मोतीलाल त्रिपाठी, कन्हैया लाल बजारी, हृदय राम कश्यप, पूरन लाल वर्मा आदि हर किसी का योगदान महत्वपूर्ण था। जिनके नाम ले सका, और जिनके नहीं ले सका, उन सभी को मैं नमन करता हूं।

महिला उद्घोषक द्वारा

  • मुख्यमंत्री जी, आप कह रहे थे कि आजादी की लड़ाई में महिलाओं, साहित्यकारों, कलाकारों आदि ने भी अपने-अपने ढंग से हिस्सा लिया था। उनमें से भी कुछ प्रमुख के नाम और काम के बारे में हमारी नई पीढ़ी जरूर जानना चाहेगी ?

मुख्यमंत्री जी द्वारा

  • आजादी की लड़ाई में हर मां, बहन, पत्नी ने साहस का परिचय दिया। घर में कल के लिए रोटी नहीं थी, लेकिन हिम्मत इतनी, कि पूछो मत। पति, भाई, बेटा आजादी के लिए लड़े, इससे बड़ा गौरव दूसरा नहीं था। आजादी की लड़ाई के साथ ही जनशिक्षा, जनचेतना, जनसेवा, जन उत्थान के काम भी चलते थे। आजाद भारत में आदर्श व्यवस्था कैसी होगी, इसका ताना-बाना भी बुना जाता था। राष्ट्रीय नेताओं से लेकर स्थानीय स्तर तक इसका प्रभाव था।
  • एक थीं डॉ. राधाबाई, जो कण्डेल सत्याग्रह के समय सन् 1920 में आंदोलनकारियों के साथ डटी रहीं। पुलिस के लाठी-डंडे खाए, लेकिन डिगी नहीं। वे शराबबंदी, पर्दा-प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ जन-जागरण करती थीं, उन्होंने कई बार जेल यात्राएं कीं।
  • रोहिणी बाई परगनिहा तो 12 वर्ष की उम्र में ही जेल चली गई थी। वे सफाई कामगारों के बच्चों की सेवा करती थीं। मरीजों की सेवा करती थीं। उनके जज्बे से बाकी लोगों में भी उत्साह जागता था।  
  • डॉ. खूबचंद बघेल की माता केकती बाई बघेल ने विदेशी वस्त्रों के खिलाफ आंदोलन करते हुए गिरफ्तारी दी थी। उन्होंने छुआ-छूत के खिलाफ जनजागरण किया था।
  • श्रीमती बेला बाई ने संकल्प लिया था कि वे पति भुजबल सिंह के साथ जेल यात्रा करेंगी। और हुआ यह कि पहले बेला बाई गिरफ्तार हुईं और दूसरे दिन उनके पति।
  • श्रीमती फूल कुंवर बाई ने पति के निधन के बाद भी पूरा समय आजादी की लड़ाई में लगा दिया और हुआ यह कि पहले मां जेल गई, बाद में बेटा मनोहर लाल श्रीवास्तव।
  • सतनाम पंथ के गुरू पूज्य श्री अगम दास जी गुरू गोसाई की धर्मपत्नी थीं श्रीमती मीनाक्षी देवी। उनका घर सत्याग्रहियों का ठिकाना था, जहां मीनाक्षी देवी सबके लिए भोजन का इंतजाम करतीं और हौसला बढ़ाती थीं। उन्होंने समाज के उत्थान के लिए बहुत कार्य किए और वे ‘मिनी माता’ के रूप में प्रसिद्ध र्हुइं। बाद में लोकसभा की सदस्य बनीं।
  • जबलपुर से गिरफ्तार कर बिलासपुर जेल में रखे गए पं. माखन लाल चतुर्वेदी ने कालजयी कविता लिखी थी- ‘पुष्प की अभिलाषा’

       चाह नहीं, मैं सुरबाला के
        गहनों में गूंथा जाऊं...
        मुझे तोड़ लेना बनमाली,
        उस पथ पर देना तुम फेंक।
        मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने,
        जिस पथ पर जावें वीर अनेक।।

  • रायपुर के वयोवृद्ध सेनानी डॉ. महादेव प्रसाद पाण्डेय, श्री केयूर भूषण, श्री पन्नालाल पण्ड्या, श्री सूरज प्रसाद सक्सेना, श्री बृजलाल शर्मा, और श्री रामकिशन गुप्ता को सब जानते हैं, उनको सभी सम्मान से देखते हैं।
  • राजनांदगांव से श्री दामोदर दास टावरी, श्री कन्हैया लाल अग्रवाल, दामोदर प्रसाद त्रिपाठी, श्री देवी प्रसाद आर्य,
  • रायगढ़ के श्री दया राम ठेठवार, बिहारी लाल थवाईत,
  • बिलासपुर से श्री नंदू राय भांगे, श्री भगवान दास, डॉ. दयाराम सलवानी, जैसी विभूति आज हमारे बीच हैं। मैं उनके दीर्घायु होने की कामना करता हूं।


पुरूष उद्घोषक द्वारा

  •  डाक्टर साहब, राज्य के आदिवासी अंचलों का बड़ा योगदान स्वतंत्रता संग्राम में था। लेकिन कालांतर में इन अंचलों के निवासियों की प्रतिभा और शौर्य को सही दिशा नहीं मिल पाई। इन अंचलों का पिछड़ापन दूर नहीं हो पाया। इस दिशा में आपकी सरकार बहुत से प्रयास कर रही है। कुछ मुख्य प्रयासों के बारे में बताना चाहेंगे?

मुख्यमंत्री जी द्वारा

  • यह सही है कि विगत लगभग छह दशकों तक सही दिशा में सही प्रयास नहीं होने से आदिवासी अंचलों में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई।
  • पिछले एक दशक के हमारे प्रयासों से काफी सुधार हुआ है। हमने शिक्षा, सुरक्षा और समग्र विकास के समन्वित प्रयास किए हैं।
  • सरगुजा को तो वामपंथी उग्रवादियों से पूरी तरह मुक्ति मिल गई है और बस्तर में अब निर्णायक सफलता मिल रही हैं।
  • हमारी पहल पर केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल सीआरपीएफ में ‘बस्तरिया बटालियन’ के गठन का निर्णय माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और माननीय गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी ने लिया है। मैं इसे अंचल के शौर्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जोड़कर भी देखता हूं।
  • पहले हमारे आदिवासी अंचल निवासियों को शारीरिक गठन के कुछ मापदण्डों के कारण सुरक्षा बलों में स्थान नहीं मिल पाता था। ‘बस्तरिया बटालियन’ में ऐसे मापदण्डों को शिथिल किया गया है।
  •  ‘बस्तरिया बटालियन’ के गठन से बस्तर संभाग के चार जिलों-बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और सुकमा के 744 स्थानीय युवाओं की भर्ती होगी, जिससे हमारे शूरवीर नौजवान अपने पारम्परिक शौर्य का इतिहास दोहराएंगे।
  • मैं यह भी मानता हूं कि महान पराक्रमी गैंद सिंह, गुण्डाधूर और उनके जैसे अनेक वीरों के वंशजों को ‘बस्तरिया बटालियन’ के माध्यम से देश सेवा का अवसर मिलेगा।

महिला उद्घोषक द्वारा

  • श्रोताओं! आपकी प्रतिक्रियाएं हमें आपके पत्र, सोशल मीडिया-फेसबुक, ट्विटर के साथ एसएमएस से भी बड़ी संख्या में मिल रही हैं। इसके लिए आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद।
  • आगे भी आप अपने मोबाइल के मेसेज बॉक्स में RKG के बाद स्पेस लेकर अपने विचार लिखकर 7668-500-500 नम्बर पर भेजते रहिए और संदेश के अंत में अपना नाम और पता लिखना ना भूलें।
  • मुख्यमंत्री जी, हमारे श्रोताओं से जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं, वे सब चाहते हैं, कि आप उस पर कुछ कहें ?

मुख्यमंत्री जी द्वारा

  • मुझे खुशी है, कि जो मुझे जानकारियां मिल रही हैं, जो पत्र मिल रहे है, अलग-अलग माध्यमोंसे मुझसे फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से संपर्क कर रहे है, मै उन सभी को धन्यवाद दूंगा।
  • विशेष रूप से ग्राम अलगीडांड-कोरबा से पूर्णिमा मरावी, ग्राम मुंडाटोला-बालोद के डोमेन्द्र नेताम, देवरी-भाटापारा के गन्नूलाल रजक आदि ने पत्र लिखकर अपने सुझाव दिए हैं।
  • फेसबुक और ट्वीटर के माध्यम से वीरेन्द्र सिंह, प्रमोद कुमार देशमुख, पिंटू यादव, राजेन्द्र प्रसाद दीक्षित, कृष्णकुमार चंद्राकर, विनोद जॉन  आदि ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
  • एसएमएस द्वारा दुर्ग के उत्कर्ष सोनबोइर ने सुझाव दिया है, कि सभी सरकारी भवनों में ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ की जाए। चारामा के वेदान्त काशी जैन का कहना है, कि शिक्षकों के लिए गणवेश अनिवार्य हो।
  • मैं आप सभी का दिल से आभारी हूं, जो यह प्रसारण सुनते हैं और अपनी प्रतिक्रिया भेजते हैं। उनके नाम का उल्लेख करना संभव नहीं है, पर आपके जो सुझाव मिल रहे हैं, उनका समुचित उपयोग करेंगे।

पुरूष उद्घोषक द्वारा

  •  श्रोताओं, अब बारी है ‘क्विज’ की।

तीसरे ‘क्विज’ का प्रश्न था-
    ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ किसके लिए है ?
इसका सही जवाब है-
       A .किसानों के लिए

  • हमें खुशी है कि इस बार बड़ी संख्या में लोगों ने जवाब भेजे हैं, जिसमें से पहले पांच जवाब भेजने वालों के नाम हैं-

    1.    रिशि कुमार धर्मा, दुर्ग
    2.    दीपक साहू, कोरबा
    3.    विशाल राठौर, रायपुर
    4.     उत्कर्ष कुमार सोनबोइर, दुर्ग
    5.     सेवन लाल राठौर, कोरबा


महिला उद्घोषक द्वारा

  • और अब समय है आज के, अर्थात् चतुर्थ क्विज़ का

    सवाल है- भूमकाल का नायक किसे कहा जाता है?
    सही जवाब A . गैंद सिंह B. गुण्डाधूर
    अपना जवाब देने के लिए अपने मोबाइल के मेसेज बॉक्स में QA लिखें और स्पेस देकर A या B जो भी आपको सही     लगे, वह एक अक्षर लिखकर 7668-500-500 नम्बर पर भेज दें। साथ में अपना नाम और पता अवश्य लिखें।
  आप सब रमन के गोठ सुनते रहिए और अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत कराते रहिए और इसी के साथ आज का अंक हम यहीं समाप्त करते हैं, अगले अंक में 11 सितम्बर को आपसे होगी फिर मुलाकात। तब-तक के लिए दीजिए हमें इजाजत।

नमस्कार।

Date: 
14 August 2016 - 9am