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गणतंत्र दिवस समारोह 2017 राष्ट्रीय परेड ,नई दिल्ली हेतु झांकी की निर्माण के लिए निविदा आमंत्रण

थीम 2017

जनसम्पर्क संचालनालय
छत्तीसगढ़, रायपुर


सामाजिक, आर्थिक विषमता को समाप्त करने वाले पथ प्रवर्तक महान संत गुरू घासीदास बाबा


छत्तीसगढ संत-महात्माओं की जन्म स्थली है। अट्ठारहवीं शताब्दी के संत गुरू बाबा घासीदास को सतनाम पंथ, सतनाम धर्म का प्रवर्तक कहा जाता है, गुरू बाबा घासीदास की जन्म स्थली और तपोभूमि गिरौदपुरी में उनके पूर्वज आज भी निवासरत है। उन्होंने अपने समय की सामाजिक, आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिभेद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान का संदेश दिया। गुरू घासीदास जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुःखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। वे सत्य की तलाश के लिए गिरौदपुरी के जंगल में (छाता पहाड़ पर) समाधि लगाये इस बीच गुरूघासीदास जी ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया तथा सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लम्बी तपस्या भी की।
गुरू बाबा घासीदास ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। उन्होंने ब्राम्हणों के प्रभुत्व को नकारा और कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरू घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। गुरू घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरू घासीदास के सिध्दांतों का गहरा प्रभाव था। गुरू घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। घासीदास जी की सात शिक्षाएँ हैं- जिनमें सतनाम् पर विश्वास रखना, जीव हत्या नहीं करना, मांसाहार नहीं करना, चोरी, जुआ से दुर रहना, नशा सेवन नहीं करना, जाति-पाति के प्रपंच में नहीं पड़ना, और ब्यभिचार नहीं करना शामिल हैं।
 गिरौदपुरी में संत गुरू बाबा घासीदास की गद्दी बनी हुई है, इस गद्दी के दर्षन के लिए दूर-दूर से दर्षनार्थी आते हैं। प्रतिदिन गुरूजी की गद्दी पर दीप प्रज्जवलित किया जाता है और आरती की जाती है। गुरूजी की गद्दी का दर्षन करना अनुयायी अपना सौभाग्य मानते हैं। यहां पहाड़ियों के नीचे 5 कुण्ड है, जिसमें एक अमृत कुण्ड कहा जाता है। इस कुण्ड के जल को बरसों रखने पर भी खराब नहीं होता, इसी कारण इसे अमृत कुण्ड कहा जाता है। इस अमृत कुण्ड के समीप ही चरण कुण्ड और इसके अलावा दो अन्य कुण्ड हैै।
महान समाज सुधारक और छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ के प्रवर्तक संत गुरू बाबा घासीदास की जन्म स्थली और तपोभूमि गिरौदपुरी में कुतुबमीनार से भी लगभग पांच मीटर ऊंचे करीब 77 मीटर ऊंचे जैतखाम का निर्माण लगभग 56 करोड़ 92 लाख रूपए की लागत से करवाया गया है। जैतखाम में सतनामी समाज की परम्परा के अनुरूप पालो (श्वेत ध्वज) चढ़ाने की रस्म पूरी की जाती है। सत्य, अहिंसा और शांति का प्रतीक श्वेत ध्वजारोहण विधि विधान से किया जाता है । बाबा गुरू घासीदास ने पूरी दुनिया को ‘मनखे-मनखे एक हैं’ अर्थात् सभी मनुष्य एक हैं, सबका खून लाल है, कहकर सम्पूर्ण मानव समाज को एकता और भाई-चारे का संदेश दिया। उनका संदेश सभी लोगों के लिए आज भी प्रासंगिक और प्रेरणादायक है।  बाबा घासीदास जी का जैतखाम और श्वेत ध्वज सत्य, अहिंसा, सद्भावना, शांति और विकास का प्रतीक है। यह जैतखाम वास्तुकला का भी एक अदभुत और अनुपम उदाहरण है। समाज के सभी धर्म गुरूओं, राजमहंतों, जनप्रतिनिधियों तथा नागरिकों के सहयोग से यहां पर कुतुबमीनार से भी ऊंचे जैतखाम का निर्माण किया गया। छत्तीसगढ़ के जन-जीवन और इतिहास में इसका विशेष महत्व है। गुरू बाबा घासीदास के उपदेशों और संदेशों को घर-घर पहुंचाने के लिए पंथी नृत्य का भी प्रदर्शन जाता है ।


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जनसम्पर्क संचालनालय
छत्तीसगढ़, रायपुर


हुनर से शिखर की ओर अग्रसर युवा
दंतेवाड़ा-बस्तर में शिक्षा क्रांति का प्रतीक एजुकेशन सिटी


नक्सलवाद आज बस्तर का एक सच है। इसका मूल कारण समाज के सशक्तिकरण का अभाव है। आज जिन-जिन अंदरूनी क्षेत्रों में नक्सलवाद अपना पांव पसारे हुए हैं, उन-उन क्षेत्रों में शिक्षा और जागरूकता के अभाव के कारण समाज की एक सशक्त आवाज गैरमौजूद है। शिक्षा, जागरूकता एवं रोजगार के विकल्प प्रदान करके समाज का सशक्तिकरण करना एवं इस समाज में भी एक आवाज पैदा करने की सोंच के साथ जो विकास मॉडल छत्तीसगढ़ ने गढ़ा है, उसे ही इसके माध्यम से प्रदर्शित करने का प्रयास किया जाएगा। एजुकेशन सिटी दंतेवाड़ा बस्तर में हो रही शिक्षा की क्रांति का प्रतीक मानी जाती है। लाइवलीहुड कॉलेज (दंतेवाड़ा) की स्थापना 16 नवंबर 2012 को हुआ। यहाँ से 9161 प्रतिभागी प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं, जिनमें 7873 प्रशिक्षार्थी नौकरी अथवा स्वरोजगार कर रहे हैं।
नक्सल प्रभावित जिले के विद्यार्थियों के लिए आस्था, निष्ठा एवं प्रयास विद्यालय प्रारंभ की गयी है। प्रयास विद्यालय में कक्षा 10 वीं उत्तीर्ण प्रतिभावान विद्यार्थियों को आई.आई.टी., ए.आई.पी.एम.टी., पी.ई.टी. तथा पी.एम.टी. कोचिंग दिलाकर देश-प्रदेश के प्रतिष्ठित संस्थाओं में इन विद्यार्थियों को प्रवेश दिलाने के उद्देष्य से इस योजना को प्रारंभ किया गया है। मुख्यमंत्री बाल भविष्य सुरक्षा योजना अन्तर्गत नक्सल प्रभावित क्षेत्र के प्रतिभावान विद्यार्थियों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा एवं प्रतिस्पर्धा के माध्यम से देष के प्रतिष्ठित इंजिनियरिंग/चिकित्सा संस्थानों में उच्चतर अध्ययन प्रदान करने के उद्देश्य से प्रयास आवासीय विद्यालय प्रारंभ किया गया है। विज्ञान विषय में अभिरूचि पैदा करने हेतु विज्ञान विषय के साथ स्नातक, स्नातकोत्तर एव बी.एड. की पढ़ाई करने के अवसर प्रदान करने के उद्देष्य से आर्यभट्ठ विज्ञान विकास केन्द्र की स्थापना दुर्ग में की गई है।  
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की लड़ाई को आगामी पीढ़ी की बेहतरी से जोड़कर देखना है। छत्तीसगढ़ मानता है कि जब तक भावी पीढ़ी की शत-प्रतिशत आबादी को षिक्षा, जागरूकता एवं रोजगार के अवसरों से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक नक्सलवाद के खिलाफ कोई भी लड़ाई निरर्थक है। इसलिए भावी पीढ़ी के सभी आयु वर्ग को ध्यान में रखकर अलग-अलग योजनाएं तैयार कर पूरी पीढ़ी को शिक्षा, रोजगार एवं स्वरोजागर के दायरे में लिया जा रहा है, ताकि जीवन में विकल्पों के अभाव में कोई भी युवा हाथ बंदूक न थामे।
पढ़ाई छोड़ चुके युवाओं को रोजगार योग्य बनाने व स्कील डेवलपमेंट के लिए छत्तीसगढ़ राज्य में प्रदेश के विभिन्न जिलों में लाइवलीहुड कॉलेज का संचालन किया जा रहा है। इसके तहत बीच में ही पढ़ाई छोड़ चुके युवाओं को विभिन्न क्षेत्रों में प्रषिक्षण देकर स्वरोजगार से जोड़ा जा रहा है। प्रदेश के लाइवलीहुड कॉलेजों में छात्रों को स्वरोजगार योग्य बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है। साथ ही ट्रेनिंग के दौरान युवाओं के रहने व खाने का खर्च भी संस्था द्वारा ही वहन किया जाता है। प्रदेश सरकार कॉलेज संचालन के लिए भवन, इंफ्रास्ट्रक्चर सहित अन्य संसाधन उपलब्ध कराती है।
नक्सलवादियों द्वारा स्कूलों को तोड़ने एवं विभिन्न गांवों में दुरूह परिस्थितियों के कारण 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के जो बच्चे स्कूल से बाहर हो गए हैं उन्हे शिक्षा और समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए  500-500 सीटर 30 आवासीय गुरूकुल विद्यालयों का निर्माण किया गया है, जिन्हें पोटा केबिन के नाम से जाना जाता है, जहां बच्चे अध्ययनरत हैं। इस तरह पूरी पीढ़ी को शिक्षा के माध्यम से अंधकार से बचाया गया है। शिक्षा बच्चों के दिल से जुड़े इसलिए स्थानीय भाषा गोंडी, हल्बी में शिक्षा प्रारंभ की गई है। बच्चे बाहरी दुनिया से रू-ब-रू हो सकंे इसके लिए प्रतिदिन तमन्ना एक्सप्रेस, तितली एक्सप्रेस चलाकर बाहरी दुनिया का भ्रमण कराया जाता है। वंचित समुदाय के बच्चे नवोदय विद्यालयों, सैनिक स्कूलों में पहुंचे, इसके लिए नन्हें परिन्दे जैसी परियोजनाएं संचालित की जा रही है। ग्यारहवीं और बारहवीं में शिक्षा के बेहतर स्तर के लिए छू-लो आसमान, प्रज्ञा जैसी योजनाएं संचालित हो रही है। बच्चे लोक सेवा आयोग और अन्य प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफल हो सकें इसके लिए भी योजनाएं संचालित की जा रही है।
एजुकेशन सिटी दंतेवाड़ा बस्तर में हो रही शिक्षा की क्रांति का प्रतीक है, जिसे प्रधानमंत्री जी ने अपने दंतेवाड़ा भ्रमण में शिक्षा का मंदिर कहा। करीब 125 करोड़ की लागत से पांच हजार बच्चों के लिए नर्संरी से लेकर कॉलेज, आई.टी.आई, पॉलिटेक्निक कॉलेज तक की शिक्षा के तैयार 100 एकड़ से भी अधिक क्षेत्र में फैली इस परियोजना में खड़े होकर बदलते बस्तर को सहज की महसूस किया जा सकता है। इसे केपीएमजी ने 2012 की अपनी रिपोर्ट में दुनिया के 100 श्रेष्ठ परियोजनाओं मेें से एक माना है।
प्रदेश के सभी जिले में स्थापित लाइवलीहुड कॉलेज प्रधानमंत्री जी की स्किल इंडिया मिशन को गति देने वाले असली पहिया साबित हो रहा हैं। बेरोजगारों के लिए निर्मित इस कॉलेज में पांचवीं कक्षा पास हो या आठवीं फेल सभी तरह के युवाओं को हुनर के माध्यम से जीवन संवारने को एक मौका फिर से देने में शासन सफल रही है। सभी नक्सल प्रभावित जिलों से आने वाले बच्चों के लिए रायपुर, भिलाई, कांकेर, जगदलपुर, अंबिकापुर में प्रयास विद्यालय स्थापित किए गए हैं, जिसमें बच्चे 11 वीं और 12 वीं की गुणवत्ता पढ़ाई के साथ आई आई टी, एन.आई.टी, एम.बी.बी.एस.का भी सपना पूरा कर पा रहे हैं।
इन समस्त प्रयासों से छत्तीसगढ़ में शिक्षा जागरूकता एवं रोजगार के अवसर देकर एक सशक्तिकृत आवाज युक्त समाज के निर्माण का प्रयास किया है, ताकि लोग सवाल पूछ सकंे शासन-प्रशासन व्यवस्था से भी विभिन्न विचारधाराओं से भी। शिक्षित होना, रोजगार के अवसर पाना, सवाल पूछने की काबिलियत हासिल करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और यह अवसर प्रदान करना हर शासन का मौलिक दायित्व है।


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छत्तीसगढ़, रायपुर


छत्तीसगढ़ का कोसा

छत्तीसगढ़ कोसा उत्पादन एवं कोसा वस्त्र निर्माण में अग्रणी राज्य के रूप में देश प्रख्यात है। छत्तीसगढ़ के कोसा वस्त्रों की कलात्मक एवं गुणात्मक डिजाईनों के निर्माण के कारण राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इनकी मांग निरंतर बढ़ रही है। छत्तीगसढ़ के जांजगीर-चाम्पा, बस्तर और रायगढ़ जिला कोसा वस्त्रों के लिए प्रमुख व्यावसायिक केन्द्र के रूप में जाना जाता है।
परिचय
सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के क्रम में मनुष्य ने अपनी सभ्यता की उद्घोषणा जिन प्रतीकों के माध्यम से की उनमें वस्त्र सबसे महत्वपूर्ण है। तन ढकने के लिए पेड़ों की छाल का इस्तेमाल करते करते वनवासी मानव ने कई विकल्पों को ढूंढ निकाला। प्राकृतिक वस्तुओं की बुनावट के अध्ययन ने उसे उन स्रोतों की तलाश के लिए प्रेरित किया, जिनसे वस्त्रों के निर्माण के लिए रेशे प्राप्त किए जा सकते हैं। कपास और कोसा जैसे प्राकृतिक स्रोत उसकी इसी तलाश का परिणाम हैं। कपास एक वृक्ष का फल है, जबकि कोसा वृक्षों से प्राप्त होने वाला ककून। खास प्रजातियों की तितलियां अपना जीवन-चक्र पूरा करती हुई कोसे का निर्माण करती हैं।
आज भी छत्तीसगढ़ के भूभाग का लगभग 50 फीसदी हिस्सा वनों से आच्छादित है। ये वन साल, साजा, अर्जुन, सेन्हा जैसे उन वृक्षों से अटे पड़े हैं, जिनमें कोसे की तितलियां अंडे देती हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के जंगलों से प्राप्त होने वाले ककूनों अपनी विशेषताओं के लिए विविधताओं से भरपूर है। विशेषताओं और प्राप्ति स्रोतों के आधार पर इन ककूनों को विविध नामों से पहचाना गया है, जैसे- मलबरी कोसा, तसर कोसा, मूंगा कोसा, ऐरी कोसा, रैली कोसा, पोली कोसा, मोमरा कोसा आदि। प्राचीनकाल से ही छत्तीसगढ़ कोसा के वस्त्रों का निर्यातक रहा है, यहां के ककूनों से प्राप्त होने वाले उच्च गुणवत्ता वाले रेशों की वजह से आज भी छत्तीसगढ़ के कोसा वस्त्रों की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तूती बोलती है।
कोसा एक संस्कृति भी  
छत्तीसगढ़ के लिए कोसा रेशों की प्राप्ति का एक स्रोत भर नहीं है, बल्कि इसने यहां की सामाजिक और सांस्कृतिक बुनावट में भी अपना योगदान दिया है। समाज ने कोसे के वस्त्र को अपने धार्मिक अनुष्ठानों में पूरे आदर के साथ जगह दी और इसे सर्वाधिक पवित्र वस्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। कोसे को स्थानीय स्तर पर मिले सामाजिक संरक्षण की वजह से बुनकरों की कई पीढियां तैयार हुईं। प्राचीन छत्तीसगढ़ के लगभग सभी प्रमुख शहरों और कस्बों में बुनकरों के मोहल्ले बस गए, जिन्हें आमतौर पर कोष्टा पारा कहकर पुकारा गया। संभवतः कोष्टा शब्द कोसे की उपजा, जिसने एक समाज को नाम दिया और कालांतर में इस समाज द्वारा बुने गए अन्य वस्त्रों को भी कोष्टउंहा कहकर पुकारा गया।

कोसा गांवों की आर्थिक रीढ़

छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था खेती किसानी पर तो आधारित रही ही है, वनोपजों ने भी अपनी बड़ी भागीदारी निभाई है। कोसा इन्हीं में से एक है। कोसा ने अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण में अपना योगदान दिया, रोजगार के अवसर सृजित किए और गांवों से शहरों की ओर होने वाले पलायन पर रोक लगाई। अत्यंत अल्प पूंजी निवेश, उत्पादन की सरल प्रक्रिया की वजह से यह उन परिवारों के लिए कृषि के विकल्प के रूप में प्रस्तुत हुआ जो या तो भूमिहीन थे या फिर जिनके पास नाम-मात्र की भूमि थी। स्वाभिमानपूर्ण स्वरोजगार के सृजन ने छत्तीसगढ़ के समाज में आर्थिक और शारीरिक शोषण की संभावनाओं को कम किया।
गौरवशाली इतिहास
छत्तीसगढ़ में कोसा उत्पादन का गौरवशाली इतिहास रहा है। प्राचीन काल में यहां के कोसे का निर्यात चीन तक हुआ करता था। यहां के गरियाबंद इलाके को तब सिल्क रूट के नाम से जाना जाता था। हाल ही में पुराविदों ने पैरी नदी पर बनाए गए ढाई हजार साल पुराने बंदरगाह को ढूंढ निकाला है, जो जलमार्ग से कोसा के निर्यात के लिए उपयोग में लाया जाता था।
कोसा का गढ़
कोसा का उत्पादन यूं तो पूरे छत्तीसगढ़ में होता है, लेकिन जांजगीर, कोरबा, रायगढ़, अंबिकापुर आदि जिलों ने धागाकरण और वस्त्रों की बुनाई में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है। हर साल करीब 40 से 50 करोड़ रुपए के कोसा वस्त्र भारत के विभिन्न प्रदेशों के साथ साथ यूरोपीय और पूर्वी एशियाई देशों में निर्यात किए जाते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक वर्तमान में 20 हजार से ज्यादा वनवासी परिवार केवल कोसे का संग्रहण करके आमदनी प्राप्त कर रहे हैं, कोसे के धागाकरण से लेकर वस्त्र-निर्माण और वस्त्रों के विपणन में लगे परिवारों का आंकड़ा अलग है।


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Date: 
21 July 2016 - 5pm