रायपुर : पर्वो पर प्राकृतिक मिट्टी से ही बनाई जाएं मूर्तियां

जल स्त्रोतों को प्रदूषण से बचाने राष्ट्रीय हरित
प्राधिकरण और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्देश

रायपुर, 27 जुलाई 2017

प्रदेश में मूर्ति विसर्जन से जलस्त्रोतों पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों की रोकथाम के लिए मूर्ति निर्माण, स्थापना तथा विसर्जन के संबंध में जन-जागरूकता संबंधी निर्देश जारी किए गए हैं। राज्य शासन के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग द्वारा राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के इन निर्देशों का सभी जिला कलेक्टरों और नगरीय निकायों को पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है।
दिशा-निर्देशों में बताया गया है कि पूजा के लिए प्राकृतिक मिट्टी से निर्मित छोटे आकार की प्रतिमाआंे का उपयोग किया जाए। अघुलनशील पदार्थ जैसे प्लास्टर ऑफ पेरिस, बेक्डक्ले, सिथेटिंक रंगों तथा डाइस आदि से सजी हुई प्रतिमाओं के उपयोग को हतोत्साहित किया जाए। पूजा सामग्री जैसे फूल, वस्त्र, कागज तथा प्लास्टिक से बने सजावट की वस्तओं आदि को मूर्ति विसर्जन के पहले अलग कर लिया जाए। विसर्जन के बाद पूजा सामग्री, फूल, कपड़े, प्लास्टिक तथा पेपर आदि को सुरक्षित ढंग से एकत्रित कर पुर्नउपयोग अथवा कम्पोस्टिंग आदि में किया जाए। गणेश उत्सव, दुर्गोत्सव तथा मोहर्रम आदि के आयोजकों से अनुरोध किया गया है कि मूर्तियों की स्थापना स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा विनिर्दिष्ट स्थानों पर उनसे अनुमति लेकर की जाए। जिला प्रशासन द्वारा तैयार रूटचार्ट में उल्लेखित मार्गों से ही विसर्जन की कार्रवाई की जानी चाहिए।
स्थानीय निकायों द्वारा विसर्जन स्थल की व्यवस्था के लिए विसर्जन से कुछ समय पहले स्थान सुनिश्चित कर आम जनता को इसके बारे में अवगत कराया जाए। छोटे आकार की मूर्ति का निर्माण के लिए संस्कृति अनुसार मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाए। मूर्ति निर्माण में सिन्थेटिक केमिकल, पेंट्स तथा डाई का उपयोग न किया जाए। मूर्ति विसर्जन स्थल पर पर्याप्त घेरा बंदी तथा सुरक्षा की व्यवस्था हो। पूर्व से ही चिन्हांकित विसर्जन स्थल पर नीचे सिंथेटिक लाइनर की व्यवस्था की जाए तथा विसर्जन के उपरांत उक्त लाइनर विसर्जन स्थल से हटा ली जाए, जिससे की मूर्ति विसर्जन के पश्चात उसका अवशेष बाहर निकाला जा सके। बांस, लकड़ी, मिट्टी का पुनः उपयोग भी किया जा सकता है। भू-भराव आदि में किया जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि मूर्तियां प्राकृतिक मिट्टी से ही बनाई जाए और इसकी ऊंचाई पांच फीट से अधिक न हो, यह सुनिश्चित किया जाए।

क्रमांक -1793/प्रेमलाल


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