जशपुरनगर : रमन के गोठ की छब्बीसवीं कड़ी का प्रसारण सुना गया

धान छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत: डॉ. रमन सिंह

        जशपुरनगर 08 अक्टूबर 2017

जशपुर जिले में रमन के गोठ की छब्बीसवीं कड़ी का प्रसारण उत्साह के साथ रविवार को सुना गया। रेडियो के साथ विभिन्न समाचार चैनलों में इसके प्रसारण की व्यवस्था होने से जिले भर में इसे सुना गया। जिला मुख्यालय के जिला गं्रथालय में सामूहिक रूप से रमन के गोठ सुनने के लिए प्रोजेक्टर की व्यवस्था की गई थी। जशपुर एसडीएम श्री एस एस. दुबे, बीईओ जशपुर श्री डी.के. यादव, गणमान्य नागरिक, अधिकारियों-कर्मचारियों, शिक्षकों, स्कूल एवं छात्रावास के विद्यार्थियों सहित बड़ी संख्या में जनसामान्य उपस्थित थे। ’रमन के गोठ’ को सामूहिक रूप से सुनने के लिए जनपद एवं नगर पंचायतों सहित अन्य स्थानों में व्यवस्था की गई थी। लोक शिक्षा केन्द्रों में भी प्रसारण को सुना गया। नवसाक्षरों सहित जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिकों सहित ग्रामीणजनों ने लोक शिक्षा केन्द्रों में रमन के गोठ को सुना। यहां लोगों ने उत्साहपूर्वक मुख्यमंत्री की बातंे सुनी। जिले के सभी अनुभाग और सभी विकासखण्ड के क्षेत्रों में नागरिकों ने टेलीविजन एवं रेडियो पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की वार्ता ’रमन के गोठ’ को बड़े उत्साह एवं उमंग से सुना। नगर एवं गांव में महिलाओं, पुरूषों, बुजुर्गो के अलावा बच्चों ने भी प्रदेश के मुखिया की वार्ता को सुना। सभी ने 20 मिनट के कार्यक्रम ’रमन के गोठ’ का प्रसारण धैर्यपूर्वक सुना।
    उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री हर महीने के दूसरे रविवार को सबेरे 10.45 से 11.05 बजे तक टी.व्ही एवं आकाशवाणी के जरिये राज्य की जनता के साथ अपने विचारों को साझा करते हैं। डॉ. सिंह ‘रमन के गोठ’ शीर्षक इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ की सामाजिक-सांस्कृतिक और प्रशासनिक गतिविधियों तथा अपनी सरकार की विकास योजनाओं के बारे में वार्तालाप शैली में जनता को जानकारी देते हैं। उनका यह अभिनव कार्यक्रम भेंटवार्ता पर आधारित होता है, जो राजधानी रायपुर सहित राज्य में स्थित आकाशवाणी के सभी केन्द्रों और विभिन्न न्यूज चैनल और सभी एफएम रेडियो में भी प्रसारित होता है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा है कि धान छत्तीसगढ़ के किसानों की आमदनी का मुख्य जरिया है और यह हमारे लिए सिर्फ फसल नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री ने आकाशवाणी के रायपुर केन्द्र से आज प्रसारित अपनी मासिक रेडियोवार्ता रमन के गोठ में प्रदेशवासियों को सम्बोधित करते हुए इस आशय के विचार व्यक्त किए। उन्होंने इस बार की अपनी रेडियोवार्ता को किसानों की बेहतरी और खेती की उन्नति के लिए सरकार के प्रयासों पर विशेष रूप से केन्द्रित किया।
कृषि आधारित कारोबार का टर्नओव्हर,  87 हजार करोड़ रूपए तक पहुंचाने का लक्ष्य
डॉ. सिंह ने वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुनी करने के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा - छत्तीसगढ़ सरकार ने इसके लिए राज्य को तीन अलग-अलग जलवायु क्षेत्र में बांटकर कार्ययोजना तैयार की है। जमीन की विशेषता के अनुरूप किसानों को बीज उपलब्ध कराए गए और प्रशिक्षण भी दिया गया। राज्य सरकार के प्रयासों से छत्तीसगढ़ में खेती और उससे संबंधित व्यवसायों का टर्नओव्हर 44 हजार करोड़ रूपए तक पहुंच गया है, जिसे वर्ष 2022 तक बढ़ाकर हम 87 हजार करोड़ रूपए तक पहुंचाना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2003-04 से 2016-17 तक 14 वर्ष में राज्य सरकार ने किसानों से छह करोड़ 91 लाख मीटरिक टन से ज्यादा धान खरीदकर सहकारी समितियों के जरिए उन्हें 75 हजार करोड़ रूपए का भुगतान किया है। वर्ष 2016-17 में सरकार ने उनसे 69 लाख मीटरिक टन धान खरीदा, जिस पर उन्हें 300 रूपए प्रति किं्वटल की दर से 2100 करोड़ रूपए का बोनस दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा-बोनस केवल धान के लिए नहीं है, बोनस तेन्दूपत्ता संग्राहकों और गन्ना उत्पादक किसानों को भी दिया जा रहा है। वर्ष 2004 से 2017 तक जहां तेन्दूपत्ता संग्रहण में एक हजार 904 करोड़ रूपए का पारिश्रमिक दिया गया, वहीं उनको वर्ष 2004 से 2015 तक लगभग एक हजार 223 करोड़ रूपए का बोनस भी मिला। प्रदेश में संचालित चार शक्कर कारखानों की सहकारी समितियों में ढाई लाख से ज्यादा गन्ना उत्पादक किसान सदस्य के रूप में शामिल हैं। उन्हें 50 रूपए प्रति किं्वटल की दर से बोनस दिया जा रहा है। डॉ. सिंह ने कहा-राज्य में जहां-जहां अलग प्रकार की खेती होती है, उन्हें बोनस देने की शुरूआत हमने की है और किसानों की अर्थव्यवस्था में इससे काफी लाभ मैं देख रहा हूं।
मुख्यमंत्री ने किसानों को बताया कि इस वर्ष 2017-18 में खरीदे गए धान का बोनस भी किसानों को दिया जाएगा, जो उन्हें अगले साल मिलेगा। मुख्यमंत्री ने किसानों को यह खुशखबरी भी दी कि इस बार अगर किसान राज्य की सरकारी समितियों के उपार्जन केन्द्रों में धान बेचेंगे तो उन्हें प्रति किं्वटल के बढ़े हुए समर्थन मूल्य और 300 रूपए बोनस मिलाकर प्रति किं्वटल 1890 रूपए यानी लगभग 1900 रूपए मिलेंगे। डॉ. सिंह ने कहा-किसान धूप में, गर्मी में बरसात में और ठंड में मेहनत करता है और उसके पसीने की एक-एक बूंद से धान का एक-एक दाना उपजता है। धान के उत्पादन में उनके परिश्रम की कीमत और उसमें जो लागत आती है, किसानों को लगता है कि उन्हें उसके लिए बोनस के रूप में अतिरिक्त राशि मिलनी चाहिए। राज्य सरकार ने उन्हें वर्ष 2013-14 में 2434 करोड़ रूपए का बोनस दिया और वर्ष 2015 में सूखा राहत में लगभग दो हजार करोड़ रूपए की सहायता दी। डॉ. सिंह ने कहा-प्रदेश में इस बार फिर अकाल की छाया है। राज्य सरकार ने 96 तहसीलों को सूखा ग्रस्त घोषित किया है, जहां किसानों को राहत देने के उपाय भी शुरू किए गए हैं। इन परिस्थितियों में जब 2100 करोड़ रूपए का बोनस हमारे किसानों के घर पहुंचेगा तो न सिर्फ इस साल वे दीवाली का त्यौहार खुशी से मना पाएंगे, बल्कि सूखे से लड़ने और आगे की कार्ययोजना बनाने में भी सक्षम होंगे।
किसानों के घर होंगे मांगलिक कार्य
 मुख्यमंत्री ने कहा-किसानों के पास पैसा आने पर उनके घरों में मांगलिक कार्य होंगे, वे अपने बेटे-बेटियों की शादी कर सकेंगे, जरूरी सामान खरीद सकेंगे और जरूरी निर्माण कार्य भी करवा सकेंगे। इस प्रकार किसान और गांवों का विकास होगा। डॉ. रमन सिंह ने अपने रेडियो प्रसारण में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि श्री मोदी के आशीर्वाद से ही राज्य सरकार को यह निर्णय लेने की शक्ति मिली। मुख्यमंत्री ने कहा-छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में मुख्य रूप से धान की खेती होती है, लेकिन जब हम दक्षिण और उत्तर की ओर बढ़ते हैं तो सम्पूर्ण बस्तर और सरगुजा संभाग में वहां के ग्रामीणों के लिए लघु वनोपज भी आमदनी का मुख्य जरिया होता है। बस्तर में तेन्दूपत्ता संग्रहण उनकी आमदनी का सबसे बड़ा साधन है।
चरण पादुका योजना का बड़ा असर, पैर कटने या जख्म होने की घटनाओं में कमी
     डॉ. रमन सिंह ने कहा -प्रदेश भर में लगभग 14 लाख से 15 लाख लोगों की जिन्दगी तेन्दूपत्ता संग्रहण से चलती है। राज्य सरकार ने उनकी मजदूरी की दर 350 प्रतिमानक बोरा से बढ़ाते हुए 1800 रूपए कर दिया है। हमने तेन्दूपत्ता संग्राहकों के जीवन में बेहतरी के लिए योजनाएं बनाई है। चरणपादुका योजना की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा-इस छोटे से काम की वजह से यानी 14 लाख तेन्दूपत्ता संग्राहकों को चरण पादुका देने का असर यह हुआ है कि पिछले आठ-दस वर्षों में पैर कटने की या जख्म होने की घटनाओं में काफी कमी आयी है। राज्य सरकार उनके बच्चों को मेडिकल, इंजीनियरिंग, आईटीआई और पालीटेक्निक में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति भी दे रही है। प्रदेश के संरक्षित वन क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 25 हजार आदिवासी परिवारों को तेन्दूपत्ता तोड़ने  में जो दिक्कत होती है, उसे ध्यान में रखकर उन्हें हर साल दो हजार रूपए कैम्पा निधि से दिए जा रहे हैं, ताकि तेन्दूपत्ता तोड़ने से उनको जो आमदनी होती, उसकी भरपाई की जा सके। डॉ. सिंह ने प्रदेश के वनवासियों को साल बीज, हर्रा, कुसुमी लाख, रंगीनी लाख, चिरौंजी, इमली और महुआ गुठली के संग्रहण के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की योजना का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में धान के साथ-साथ अब मक्के की खेती में भी वृद्धि हो रही है।
 राज्य में धान की पैदावार में 39 प्रतिशत वृद्धि
 मुख्यमंत्री ने कहा-राज्य सरकार ऐसे उपाय कर रही है, जिससे किसानों को आमदनी के अन्य साधन भी मिल सके। उन्होंने श्रोताओं से कहा-आपको यह जानकार खुशी होगी कि छत्तीसगढ़ धान का कटोरा होने के साथ-साथ अब फलों और सब्जियों का टोकरा भी बन गया है। सरकार के प्रयासों से दो फसली रकबा पंाच लाख हेक्टेयर से बढ़कर दस लाख 50 हजार तक पहुंच गया है। फसल सघनता 119 प्रतिशत से बढ़कर 137 प्रतिशत हो गई है। धान के उत्पादन में 39 प्रतिशत, गेहूं के उत्पादन में 24 प्रतिशत और दलहन-तिलहन के उत्पादन में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पिछले दस वर्षों में छत्तीसगढ़ में उद्यानिकी फसलों का रकबा दो लाख हेक्टेयर से बढ़कर आठ लाख 31 हजार हेक्टेयर और उत्पादन 17 लाख मीटरिक टन से बढ़कर 91 लाख मीटरिक टन तक पहुंच गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा-फसल विविधिकरण (फसल चक्र परिवर्तन) हमारे लिए सिर्फ नारा नहीं, बल्कि राज्य के किसान इसे अपनाते जा रहे हैं। उद्यानिकी फसलों के रकबे और उत्पादन में जो वृद्धि आप देख रहे हैं, वह अपने-आप में चमत्कृत करने वाली है। उन्होंने कहा-प्रदेश में उद्यानिकी फसलों को बढ़ावा देने के लिए कृषक उत्पादक संगठन बनाए जा रहे हैं, जिनमें 40 हजार से ज्यादा किसान पंजीकृत हो गए हैं। उनके लिए बाजार की व्यवस्था भी की जा रही है। राज्य में डेयरी, पशुपालन और मछली पालन को बढ़ावा देने के फलस्वरूप किसानों की आमदनी में भी वृद्धि हो रही है।
छत्तीसगढ़ के किसान अब हर साल, खरीदते हैं दस हजार ट्रेक्टर
मुख्यमंत्री ने कहा-खेती की लागत को कम करने और किसानों को विभिन्न प्रकार की आर्थिक सहायता देने के फलस्वरूप उनकी क्रय शक्ति बढ़ रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा- राज्य गठन के समय छत्तीसगढ़ में एक हजार टेªक्टर खरीदे जाते थे, लेकिन अब वर्ष 2019-10 के बाद आज की स्थिति में हमारे किसान हर साल 10 हजार से ज्यादा टेªक्टर खरीद रहे हैं। आज छत्तीसगढ़ में किसानों के पास डेढ़ लाख से ज्यादा ट्रेक्टर हैं, जो उनकी बढ़ती हुई क्षमता और खेती के क्षेत्र में हो रही खेती का प्रतीक है। डॉ. सिंह ने कहा- राज्य में वर्ष 2011 तक हार्वेस्टरों की संख्या नगण्य थी, जबकि आज की स्थिति में 1400 पंजीकृत हार्वेस्टर हैं। सिंचाई पम्पों की संख्या 72 हजार थी, जबकि आज हमारे यहां लगभग साढ़े चार लाख किसानों के पास सिंचाई पम्प हैं।
बस्तर में आठ हजार हेक्टेयर से ज्यादा में हो रही काजू की खेती
मुख्यमंत्री ने खेती के क्षेत्र में बस्तर में आ रहे परिवर्तन का उल्लेख करते हुए कहा-सहकारिता के जरिए वहां किए जा रहे उपाय काफी सफल हो रहे हैं। बस्तर अंचल में आठ हजार हेक्टेयर से अधिक रकबे में काजू के पौधे लहलहा रहे हैं और वहां इसका वार्षिक उत्पादन छह हजार मीटरिक टन से ज्यादा हो गया है। इससे बास्तानार, बकावण्ड, बस्तर, तुरेनार, तोकापाल और दरभा क्षेत्रों में खाली पड़ी जमीन और जंगल को अतिक्रमण से बचाने में भी मदद मिल रही है। मुख्यमंत्री ने कहा- काजू प्रसंस्करण के लिए बस्तर के ग्राम आसना में सहकारिता के मॉडल के अनुरूप कारखाना लगाया जा रहा है। इसका संचालन भी स्व-सहायता समूह द्वारा किया जाएगा। आदिवासी परिवारों को स्व-सहायता समूहों के माध्यम से काजू के 300-300 पौधे दिए जा रहे हैं, जो राजस्व और वन विभाग की भूमि पर लगाए जाएंगे। इससे बस्तर में काजू का कारोबार 35 करोड़ रूपए से ज्यादा का होने का अनुमान है। केरल, कर्नाटक और गोवा में भी छत्तीसगढ़ के बस्तर के काजू बेचने के लिए अनुबंध की तैयारी की जा रही है।

स.क्र./23/ 

 


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