कोरबा : कोसा उत्पादन में प्रदेश में नंबर वन बना कोरबा जिला

कोरबा 7 दिसंबर 2017

राज्य निर्माण के पश्चात प्रदेश में गत चैदह साल के भीतर विकास की अविरल गंगा बही है। नित नये कार्ययोजना बनने के साथ रोजगारन्मुखी कार्य से ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने और उनके जीवन स्तर को उपर उठानें में शासन के रेशम विभाग का भी बड़ा योगदान है। रेशम विभाग की पहल से आज कोरबा जिला कोसा उत्पादन में नंबर वन तो बना ही, विभाग की कार्ययोजना से  इस जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में कोसा उत्पादन की नई शुरूआत और यहा बेरोजगार बैठे ग्रामीणों, पहाड़ी कोरवाओं को काम मिला। यही वजह है कि अब कोसा कृमि पालन को आमदनी का आधार मानकर लोग इससे जुड़ने लगे है और आत्मनिर्भर बनने लगे है। जिले में 1250 हेक्टेयर क्षेत्र में कोसा कृमिपालन किया जा रहा है। गत वर्ष एक करोड़ 57 लाख 86 हजार नग कोसा उत्पादन हुआ और 15 सौ हितग्राही लाभान्वित हुये। रिकार्ड उत्पादन के साथ कोरबा जिला कोसा उत्पादन में सिरमौर बन गया है, वही जिले के छुरीकला ग्राम की पहचान कोसा वस्त्र उद्योग के रूप में स्थापित है।
जिले में वृहत पैमाने पर कोसा उत्पादन किया जा रहा है। भौगोलिक परिस्थ्तिियों तथा हरे भरे वन की वजह से यहा कोसा उत्पादन को और बढ़ाने कृमि पालन की अपार संभावनायें भी है। इसी संभावनाओं को आधार बनाकर रेशम विभाग हर साल कोसा उत्पादन बढ़ा रहा है। जिले में 19 विभागीय एवं 22 विस्तार केंद्र है।
रकबा बढ़ने के साथ बढ़ा उत्पादन
जिले मेें कोसा उत्पादन को बढ़ावा देने विभाग की कार्ययोजना काम आई। वर्ष 2003-04 में 800 हेक्टयेयर क्षेत्र में ही उत्पादन होता था। इससे 52 लाख 21 हजार नग कोसाफल का उत्पादन और 800 हितग्राही लाभान्वित हुये थे। विभाग के अधिकारी ए के बाजपेयी ने बताया कि विभागीय एवं मनरेगा मद से हर साल नये वनक्षेत्रों का चयन एवं पौधरोपण कार्य को बढ़ावा देकर कोसा कृमि पालन एवं उत्पादन में लगातार वृद्धि की गई। परिणाम स्वरूप वर्ष 2013-14 में 1100 हेक्टयेर में एक करोड़ 30 लाख् 79 हजार नग कोसाफल का उत्पादन हुआ और 1200 हितग्राही लाभान्वित हुये। वर्ष 2014-15 में 1200 हेक्टयेर में एक करोड़ 32 लाख 62 हजार नग कोसाफल का उत्पादन हुआ और 1400 हितग्राही लाभान्वित हुये। वर्ष 2015-16 में 1250 हेक्टयेर में एक करोड़ 41 लाख 25 हजार नग टसर कोसाफल का उत्पादन हुआ और 1450 हितग्राही लाभान्वित हुये। गत वर्ष 2016-17 में 1250 हेक्टयर क्षेत्र में एक करोड़ 57 लाख 86 हजार नग टसर कोसाफल उत्पादन कर कोरबा जिला सर्वाधिक उत्पादन वाला जिला बन गया। एक तरफ जहां लगातार कोसाफल उत्पादन में वृद्धि होती चली गई वही दूसरी तरह हितग्राहियों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। वर्तमान में लगभग 1500 हितग्राही है जो कोसाकृमि पालन कर आय अर्जित कर रहे है।
आर्थिक रूप से सक्षम बन रहे पहाड़ी कोरवा व विरहोर
कोसा उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ यहा के दूरस्थ एवं सुदूर अंचल में निवास करने वाले पहाड़ी कोरवाओं एवं विरहोरों जनजाति को भी कोसा कृमिपालन से प्रशिक्षण के माध्यम से जोड़ा गया। कोरबा विकासखंड के ग्राम कदमझेरिया, जामभांठा, हरदीमौहा, देवद्वारी, टोकाभाठा, एवं चुईया के वनाच्छिदत क्षेत्रों में साजा, कहवा एवं सेन्हा के पौधों से कोसा का उत्पादन किया गया। इस कार्य में लगभग 100 पहाड़ी कोरवाओं एवं बिरहोरों को रोजगार मिलने के साथ आर्थिक रूप से सक्षम बनने और सामाजिक उत्थान की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिला। प्रति हितग्राही दस हजार रूपये औसत से आॅनलाइन भुगतान बैंक खाते में करने के साथ ही कोसा कृमिपालन कार्य में लगने वाले आवश्यक सामग्रियों जैसे छाता, टार्च, गमबूट, दरी, तिरपाल, आदि का निःशुल्क वितरण किया गया है। कोसा कृमिपालन में होने वाले लाभ को देखकर पहाड़ी कोरवा एवं विरहोर जनजाति के लोग इससे जुड़ने लगे है।
दिल्ली में कोसा के विकास परिचर्चा में शामिल हुआ किसान
जिले को कोसा कृमिपालकों द्वारा अपने परिश्रम से सम्मानजनक आमदनी अर्जित किया जा रहा है। कई ऐसे हितग्राही है जिनके मेहनत व परिश्रम को देखकर अन्य स्थानों में कोसा उत्पादन बढ़ाने हेतु आयोजित परिचर्चा में भाग लेने का अवसर मिल रहा है। विकासख्ंड करतला के ग्राम बोतली के किसान रामलाल राठिया को भी गत वर्ष दिल्ली में केंद्रीय कपड़ा मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी के मुख्य आतिथ्य में आयोजित कोसा के विकास परिचर्चा में भाग लेकर छत्तीसगढ़ राज्य का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। रामलाल ने बताया कि वह 12 साल से कोसा कृमिपालन का कार्य कर रहा है। पिछले साल ही 75 हजार रूपये की आमदनी हुई। जिससे मोटरसायकल की खरीदी और बच्चों की पढ़ाई में खर्च किया।
अलग अलग माध्यम से होता है उत्पादन
टसर कोसाफल का उत्पादन

जिले में टसर कोसाफल उत्पादन हेतु स्थानीय गरीब, अनुसूचित जनजाति वर्ग एवं कमजोर वर्गो के लोगों द्वारा विभागीय केन्द्रांे पर प्राथमिक खाद्य पौधे साजा एवं कौहा के पौधांे पर तथा प्राकृतिक रूप से जिले के वन क्षेत्रों पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध प्राथमिक एवं द्वितीयक खाद्य पौधे सेन्हा प्रजाति पर कोसा कृमिपालन कर कोसाफलों का उत्पादन किया जाता है। इन कोसाफलों को शासन के द्वारा निर्धारित समर्थन मूल्य पर प्राथमिक सहकारी समिति द्वारा क्रय कर भुगतान किया जाता है। कोसा कृमिपालन हेतु कोसा बीज केन्द्रांे के माध्यम से कोसा कृमिपालकों को न्यूनतम दर पर बीज उपलब्ध कराये जाते है। वर्ष में तीन फसलें होती है। प्रत्येक फसल औसतन 45 से 55 दिनों की होती है।
नैसर्गिक कोसाफलों का संग्रहण:-
साल एवं सेन्हा के वृक्ष उपलब्ध है, इन वृक्षो में प्राकृतिक रूप से नैसर्गिक कोसाफलों का उत्पादन होता है। इन कोसाफलों को स्थानीय ग्रामवासियांे द्वारा संग्रहित कर निकटतम हाट बजारों मे विक्रय किया जाता है। प्रतिवर्ष नैसर्गिक कोसाफलों की प्रजाति को बढावा देने हेतु विभाग द्वारा नैसर्गिक प्रगुणन कैम्प लगाये जाते है। जिसमें कोसाफलों की माला टांगकर बीज निर्माण कर साल एवं सेन्हा के वृक्षांे पर छोड़ा जाता है। नैसर्गिक कोसाफल का मूल्य लगभग 3 रू. तक होता है। वर्ष भर मे दो फसल प्रथम भादेां फसल (माह अगस्त-सितंबर) एवं द्वितीय चैती फसल (माह फरवरी-मार्च) में कोसाफलों का संग्रहण होता है।
 
मलबरी रेशम कोया का उत्पादन:-
कोरबा जिले में मलबरी रेशम कोया का उत्पादन स्थानीय गरीब, अनुसूचित जाति एवं कमजोर वर्गो के लोगों द्वारा विभागीय केन्द्रों पर मलबरी प्रजाति के पौधों पर रेशम कृमिपालन कर रेशम कोयों का उत्पादन किया जाता है। इन कोसाफलों को शासन के द्वारा निर्धारित सर्मथन मूल्य पर प्राथमिक सहकारी समितियों द्वारा क्रय कर भुगतान किया जाता है। कृमिपालन हेतु रेशम केन्द्रांे पर शासन द्वारा निःशुल्क कृमिपालन भवन एवं रेशम के बीज कृमिपालकों को उपलब्ध कराये जाते है। वर्ष में औसतन एकांतरिक क्रम से कम से कम पंाच फसलें होती है।
टसर कोसाफलों का धागाकरण:-
कोरबा जिले में टसर कोसाफलों का धागाकरण का कार्य स्थानीय गरीब, आदिवासी एवं कमजोर वर्गो द्वारा बनाये गये महिला समूह के सदस्यों द्वारा वर्तमान में कटघोरा एवं कोरबा क्षेत्र में समूहों के द्वारा किया जाता है। समूह को धागाकरण हेतु भवन एवं रीलिंग, स्पिनिंग मशीन निशुल्क विभाग द्वारा उपलब्ध करायी जाती है। समूह केा ककून बैंक के माध्यम से शासन द्वारा निर्धारित विक्रय मूल्य पर कोसाफल उपलब्ध कराया जाता है। इनके द्वारा उत्पादित यार्न का विक्रय खुले बाजार मे समूह स्वंय करता है तथा प्राप्त आय को खर्च काटकर आपस में बांट लेते है।


क्रमांक/1155/कमलज्योति

 

 


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